अविनाश वाचस्पति ने कर ली आंखें लाल
चैट पे आते ही कल मुझ से किया सवाल
"वाद-विवाद" क्यों ?
"संवाद" क्यों नहीं ?
मैंने कहा,
"अब बेवकूफों के सर पे सींग तो होते नहीं,
वरना मेरे भी होते"
और मुझसे भी पहले राक्षसराज कंस के होते"
मुकेश खोरडिया बोले, "कंस मामा" के सींग होते भला किसलिए ?
मैं बोला,
"देवकी और वसुदेव को बन्दीगृह में साथ-साथ रखा इसलिए"
कंस की जगह अगर अपना कोई बुद्धिजीवी ब्लोगर होता
जैसे ताऊ रामपुरिया, ललित शर्मा, राजीव तनेजा या राज भाटिया
तो ऐसी मूर्खता हरगिज़ नहीं करता
दोनों को अलग-अलग जेल में भरता
इस प्रकार हालात अपने पक्ष में एरेन्ज कर लेता
और एक idea से अपनी life change कर लेता
रही बात सम्वाद की
और वाद-विवाद की
तो मेरा दृढ रूप से मानना है कि वाद-विवाद, बकवाद नहीं है
उन्माद के माहौल में वाद-विवाद ही सम्भव है,सम्वाद नहीं है
जब राम के देश में, राम की जन्म-भूमि तक निर्विवाद नहीं है
तो मेरा 'वाद-विवाद मंच' बनाना आम बात है, अपवाद नहीं है
क्योंकि वाद-विवाद से न केवल हास और परिहास बनते हैं
बल्कि किस्से, कहानियां, किवदन्तियां व इतिहास बनते हैं
वाद-विवाद नहीं होता तो कुरुक्षेत्र में गीता का जनम नहीं होता
अष्टावक्र, शुक्राचार्य, विदुर, आस्तिक जैसों का क़रम नहीं होता
विवाद तो अनिवार्य प्रक्रिया है प्रसंग को उभारने की
यानी दही को मथ - मथ कर माखन निकालने की
जब देवों और राक्षसों में कोरे सम्वाद से हल नहीं निकला
और सागर मंथन के ज़रिये जब तक हलाहल नहीं निकला
तब तक क्या हासिल हुआ था "ठन ठन गोपाल ?"
ऐरावत से लेकर अमृत तक सारे के सारे रत्न मन्थन से ही प्राप्त हुए हैं
इसलिए हे वाचस्पतिजी !
मेरी तरह आप भी मान लीजिये कि
कि उन्माद के मसले सम्वाद से नहीं,वाद-विवाद से ही समाप्त हुए हैं
-अलबेला खत्री